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    काजी फरीद अहमद.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2014 को लाल किले पर खड़े होकर बड़े अरमानों से ‘जन धन योजना’ लॉन्च की थी. सोचे थे कि गरीबों के खाते खुलेंगे, जनता बैंकिंग से जुड़ेगी, अर्थव्यवस्था सुधरेगी. लेकिन जमीन पर जो घुइयां बोई जा रही थीं, उनके बारे में तो किसी को पता ही नहीं था. खाते चलते रहें, चलें न तो कम से कम चलते दिखते रहें और इज्जत बची रहे, इसके लिए बैंक वाले गजब की स्कीम निकाल लाए. बैंकों ने जन धन योजना के अंडर खोले गए जीरो बैलेंस खातों में अपने पास से एक-एक रुपए जमा करवा दिया. अब इससे बैंकों और सरकार की इज्जत बची या मटियामेट हुई, पता नहीं इसका जवाब कौन देगा.


जन धन योजना लॉन्च होने के बाद पहले साल में लगभग 17 करोड़ अकाउंट खोले गए थे. इनमें से आधे खाते से ज्यादा जीरो बैलेंस वाले थे. यानी खाते खुले, लेकिन जिनका खाता था, उन्होंने कुछ भी जमा नहीं किया. अब इन खातों की असलियत जानने की कोशिश की, तो पता चला कि इन जीरो बैलेंस वाले खातों को कम करने के लिए इनमें एक-एक रुपया डाला गया. एक यूजर की अपडेट हो चुकी पासबुक से पता चला कि 29 सितंबर, 2015 को उसके खाते में एक रुपया डाला गया था. ये उसने नहीं डाला था. कहीं से आ गया था बस. अब आज के जमाने में इतना उपकार कौन करता है!
जब बैंकों के कर्मचारियों ने खुद इन खातों में एक-एक रुपए डाले हैं. जब ब्रांच मैनेजरों ने कहा कि उनके ऊपर टॉप लेवल से प्रेशर था जीरो बैलेंस वाले खाते कम करने का. अब जब जीरो बैलेंस वाला खाता यूज ही नहीं हो रहा है, तो एक ही शॉर्टकट बचा था. एक रुपया डाल दो. बैंकों ने वही किया. बैंकों का ये तिकड़म असम, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में झामफाड़ तरीके से चल रहा है. लाखों लोगों को पता भी नहीं और उनके खाते में एक रुपया आ गया.
जानकारी के अनुसार से पता चला कि 16 बैंकों में लगभग 1.05 करोड़ ऐसे जन धन खाते हैं, जिनमें एक रुपया डाला गया. जिन बैंकों की छाती 50 इंच से ऊपर थी, उन्होंने दो से पांच रुपए तक डाल दिए. डाले गए. बैंकों की इस चालाकी से जीरो बैलेंस वाले खाते तेजी से कम हो गए. सितंबर, 2014 में ऐसे खातों की संख्या 76% थी, जो अगस्त, 2015 में 46% रह गए. 31 अगस्त, 2016 को तो ये केवल 24.35% बचे. अब कोई देखेगा तो यही कहेगा न कि जनता बड़ी होशियार है और खाता खुलवाकर उसका यूज भी कर रही है.
आपको पता है किस बैंक ने कितने खातों में ये थेथरई की है? पंजाब नेशनल बैंक ने जन धन योजना में 1.36 करोड़ खाते खोले थे, जिनमें से 39.57 लाख खातों में एक रुपया डाला गया. बैंक ऑफ बड़ौदा ने 1.4 करोड़ खाते खोले थे, जिनमें से 12.97 लाख खातों में एक रुपया डाला गया. यूको बैंक ने 74.6 लाख खाते खोले थे, जिनमें से 11.06 लाख खातों में एक रुपया डाला गया. और ये तो वो तीन बैंक हैं जो इस मामले में टॉप पर हैं. अब सबसे बड़ा सवाल उठता है कि इतना पैसा आया कहां से. तो भइया बैंकों के ब्रांच मैनेजर इस सवाल का जवाब उतनी ही ईमानदारी से दे रहे हैं, जितनी ईमानदारी से उन्होंने एक-एक रुपए डलवाए. बोले ये पैसा दूसरे फंड्स का है, जिन्हें खर्च करने का अधिकार ब्रांच के कर्मचारियों को होता है. जैसे एंटरटेन्मेंट अलाउंस, कन्वेंस अलाउंस, कैंटीन सब्सिडी, ऑफिस मेंटिनेंस, डीडी से मिले रुपए और ऑनलाइन ट्रांसफर से मिले रुपए.
वैसे सोचने वाली एक बात ये भी है कि खाते लाखों में थे और रुपए जमा किए गए 1-1. तो वो कौन से लोग थे जो इतने धैर्यवान थे. कुछ खातों में बैंकों के बिजनस करेसपॉन्डेंट एजेंट (BC) और बैंक मित्रों ने भी पैसा डलवाया. ‘बैंक मित्र’ समझते हैं? ये वो लोग होते हैं जो बैंकों की जानकारी गांववालों के पास ले जाते हैं और गांववालों के बैंक से जुड़े काम करवा देते हैं. इन जन धन योजना वाले खाते खोलने और उनमें पैसे डालने-डलवाने का अधिकार होता है.
खाता चलाना सीख जाएं, इसलिए उनके पास जा-जाकर एक-एक रुपया डलवा रहे हैं. जब बीसीए और बैंकमित्र ये सब काम कर सकते हैं तो पीएम मोदी को फेफड़े झोंकने की क्या जरूरत है. वैसे एक बात जरूर है. बैंकवालों ने चाहे जितने सवालों के जवाब दे दिए हों, लेकिन ये किसी ने नहीं बताया कि प्रेशर डालने वाला ये ‘टॉप लेवल’ आखिर है कौन.

             मेरा बैंक बदल रहा है, एक रुपया डलवा रहा है.

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